क्या हो तुम

अक्सर उन अनींदी रातों में, या अधखुली आँखों में, उन अनदेखे, अधूरे से ख्वाबों में, ढूंढ़ता हूँ तुम्हे मैं, और तुम, देखती हो मुझे, खुशनुमा हवाओं के सांचे में, ढली हुई, पहली ओस की बूंदों में, धुली हुई, एक ज़िंदा ख्वाब सी, अपनी उन भोली आँखों से, तब खुद से पूछता हूँ मैं, की क्या हो तुम, सलोनी सी आँखों में, अनदेखे ख्वाब लिए, बदन को हौले से छूती, हवा हो तुम,
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उड़ान

उड़ान भरनी है मुझे, तेरे आसमानों में, छूना है इन टिमटिमाते तारों को, बचपन से लुभाते आये हैं, ये मुझे, अब बड़ा हो गया हूँ, सोचता हूँ, पा ही लूँ इन्हें, नापना है तेरा ये सारा जहाँ मुझे, अपने परों से, देखूं कैसे बनाया है तुने, इतना बड़ा संसार, कैसे भरे इतने रंग, जब उमंग इतनी है मन में, तो आँखों में, उदासी, एक अजनबी सा निशान, क्यों छोड़ जाती है हमेशा,
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यादों का पानी

बस यूँ ही, आज यादों के पन्ने पलटते, कुछ याद आया, वो बारिश, वो कागज के जहाज, वो गुडिया, और गुड्डे की बारात, वो टूटी रंगीन सी चूडियाँ, जो कभी सजाती थी, माँ का हाथ, लगता है, की अभी कल ही तो, मेरे दांत टूटे थे, नई साइकल से गिर कर, अभी कल ही तो, खायी थी, नानी से डाट, अभी कल ही तो, चुराए थे, रामू काका के बाग से अमरुद,
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निःशब्द

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पता है मुझे…

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